आज का ये चिट्ठा हिंदी की वर्णमाला में कितने वर्ण हैं, इस पर आधारित है।
हिंदी भारोपीय भाषा परिवार की सदस्या है। और संस्कृत भी इसी भाषा परिवार की सदस्या है। हिंदी का उद्गम संस्कृत से ही हुआ है। संस्कृत भाषा का उद्गम जिस मूल भाषा से हुआ होगा वो अब लुप्त है। संभवतः इसी कारण आजकल के संस्कृत और हिंदी भाषी "ऋ" वर्ण का उच्चारण भूल चुके हैं। यद्यपि कुछ शताब्दियों से इसे "रि" (उत्तर भारत में) या "रु" (दक्षिण भारत में) की तरह उच्चरित किया जाता है लेकिन ये इसकी मूल ध्वनि नहीं है।
वर्ण किसी भी भाषा की सबसे छोटी ध्वनि है जिससे उस भाषा के सार्थक शब्दों का निर्माण होता है। इन ध्वनियों का संकलन ही उस भाषा की वर्णमाला कहलाता है।
वर्णों के उच्चारण और प्रयोग के दृष्टिकोण से इन्हें दो भागों में विभक्त किया जाता है—स्वर और व्यंजन।
स्वर उन्हें कहते हैं जिनके उच्चारण में किसी और वर्ण की सहायता नहीं ली जाती। इनके उच्चारण में फेफड़ों से आने वाली वायु बिना किसी अवरोध के बाहर निकलती है।
व्यंजन ऐसे वर्ण हैं जिनका उच्चारण बिना स्वर के नहीं किया जा सकता। इनके उच्चारण में भीतर से आने वाली वायु मुख विवर में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में बाधित होती है।
मूलतः हिन्दी वर्णमाला में वर्णों की संख्या ४४ है—११ स्वर और ३३ व्यंजन। लेकिन हिंदी की अपनी दो विशेष ध्वनियाँ हैं जिन्हें द्विगुण या उत्क्षिप्त कहते हैं। इस तरह वर्णमाला परिवार ४६ वर्णों का हो जाता है।
स्वर (११)
हिंदी भारोपीय भाषा परिवार की सदस्या है। और संस्कृत भी इसी भाषा परिवार की सदस्या है। हिंदी का उद्गम संस्कृत से ही हुआ है। संस्कृत भाषा का उद्गम जिस मूल भाषा से हुआ होगा वो अब लुप्त है। संभवतः इसी कारण आजकल के संस्कृत और हिंदी भाषी "ऋ" वर्ण का उच्चारण भूल चुके हैं। यद्यपि कुछ शताब्दियों से इसे "रि" (उत्तर भारत में) या "रु" (दक्षिण भारत में) की तरह उच्चरित किया जाता है लेकिन ये इसकी मूल ध्वनि नहीं है।
वर्ण किसी भी भाषा की सबसे छोटी ध्वनि है जिससे उस भाषा के सार्थक शब्दों का निर्माण होता है। इन ध्वनियों का संकलन ही उस भाषा की वर्णमाला कहलाता है।
वर्णों के उच्चारण और प्रयोग के दृष्टिकोण से इन्हें दो भागों में विभक्त किया जाता है—स्वर और व्यंजन।
स्वर उन्हें कहते हैं जिनके उच्चारण में किसी और वर्ण की सहायता नहीं ली जाती। इनके उच्चारण में फेफड़ों से आने वाली वायु बिना किसी अवरोध के बाहर निकलती है।
व्यंजन ऐसे वर्ण हैं जिनका उच्चारण बिना स्वर के नहीं किया जा सकता। इनके उच्चारण में भीतर से आने वाली वायु मुख विवर में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में बाधित होती है।
मूलतः हिन्दी वर्णमाला में वर्णों की संख्या ४४ है—११ स्वर और ३३ व्यंजन। लेकिन हिंदी की अपनी दो विशेष ध्वनियाँ हैं जिन्हें द्विगुण या उत्क्षिप्त कहते हैं। इस तरह वर्णमाला परिवार ४६ वर्णों का हो जाता है।
स्वर (११)
- ह्रस्व-४
- दीर्ध-७
व्यंजन (३३)
- स्पर्श-२५
- अंतःस्थ-४
- ऊष्म-४
- द्विगुण या उत्क्षिप्त-२
कुछ लोग संयुक्त व्यंजन (क्ष , त्र , ज्ञ) को भी वर्णमाला में गिनते हैं जो अनुचित है।
अरबी-फारसी-उर्दू के शब्दों के लिए कुछ व्यंजनों के नीचे बिंदु ("."- नुक्ता) लगाने का प्रबंध है लेकिन उन्हें उन मूल व्यंजनों के विकार के रूप में जाना जाता है बजाए इसके कि उन्हें वर्णमाला में शामिल किया जाए। ये हैं—
क़ ख़ ग़ ज़ फ़
अरबी-फारसी-उर्दू के शब्दों के लिए कुछ व्यंजनों के नीचे बिंदु ("."- नुक्ता) लगाने का प्रबंध है लेकिन उन्हें उन मूल व्यंजनों के विकार के रूप में जाना जाता है बजाए इसके कि उन्हें वर्णमाला में शामिल किया जाए। ये हैं—
क़ ख़ ग़ ज़ फ़
