शनिवार, 26 सितंबर 2015

तुमको देखा तो ये ख्याल आया

रात थी बारिश की। और रेडियो पर धीमी आवाज में विविध भारती स्टेशन से भी गानों की बरसात हो रही थी। मैं दसवीं पास कर आगे की पढ़ाई के बारे में सोच रहा था। तभी रेडियो पर बजते एक गीत ने ध्यान खींचा। गीत थागीत नहीं बल्कि गजल थी वो—"तुमको देखा तो ये ख्याल आया"। कुछ मौसम ऐसा तो कुछ उम्र वैसी, कुछ सरलता गजल की तो कुछ जगजीत जी की आवाज की मधुरताबस वो दिन और आज का दिनइतना लगाव किसी और गजल से नहीं।

तुमको देखा तो ये ख्याल आया
जिंदगी धूप, तुम घना साया।

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की
आज फिर दिल को हम ने समझाया।

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया।

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
वक्त ने ऐसा गीत क्यों गाया।

जावेद अख्तर के लिखे इस गजल ने, जिसे साथ-साथ सिनेमा के लिए कुलदीप सिंह ने संगीतबद्ध किया जगजीत जी की आवाज में, पता नहीं मुझ जैसे कितने लोगों को अपने आकर्षण में बाँधा है। १९८२ में आई इस सिनेमा में इसका फिल्मांकन इसके अभिनेता-अभिनेत्री फारुख शेख और दीप्ती नवल पर हुआ है।

इस गजल की अंतरात्मा है प्रेम और उसके खो जाने की आशंका। अब चाहे यह प्रेम एक प्रेमी-प्रेमिका का हो, एक पति-पत्नी का हो, दो साथियों का हो, माता-पिता का अपनी संतानों से या एक भक्त का उसके भगवान से! जब दो लोग प्रेम में होते हैं तो दोनों को एक-दूसरे के खोने का भय तो कहीं न कहीं रहता ही है। जैसे प्रेमी-प्रेमिका का कि उनका प्रेम अधूरा ही रह जाए! पति-पत्नी का कि शायद जिंदगी भर वैवाहिक संबंध न निभे! माँ-बाबूजी का कि उनकी संतानें उनसे पराई न हो जाएँ! बच्चों का कि उनके माता-पिता का आशीर्वाद एवं स्नेह सदा बना रहे!

सुनिए-देखिए इस गजल कोयादें ताजा कीजिए ८०-९० के दशक की मासूमियत की, निर्दोष-सी मुहब्बत की, तड़क-भड़क से अलग माहौल की, अपने जीवन से जुड़ी ऐसी बातों की जब आप बरबस गुनगना उठे हों"तुम चले जाओगे तो सोचेंगे हमने क्या खोया, हमने क्या पाया"।