बँगला भाषा में श्री प्रमथनाथ भट्टाचार्य (उपनाम—श्री शंकरनाथ राय) की 'भारतेर साधक' ख्याति प्राप्त पुस्तक है। इस में उन्होंने विभिन्न काल के उच्चकोटि के साधकों का जीवन दर्शाया है। इन साधकों का चरित्र मनुष्य जीवन के आदर्श का उत्प्रेरक है। बचपन से लेकर बुढ़ापा तक—सभी को यह कृति पढ़नी चाहिए।
महामहोपाध्याय डा॰ गोपीनाथ कविराज ने इसकी प्रशंसा में लिखा है—
'भारत के महान् साधक' नामक ग्रन्थ में इसलिए विभिन्न मार्ग के साधकों के प्रति समरूप से श्रद्धाञ्जलि अर्पित की गई है, और यह देखकर चित्त में बहुत प्रसन्नता होती है, क्योंकि साधकों के प्रति श्रद्धार्पण के विषय में पथ या मार्ग को प्रधान न मानकर लक्ष्य ही को प्रधान मानना चाहिए। कारण, बहिरङ्ग-जीवन मुख्य नहीं है, आन्तर-उपलब्धि ही साधक-जीवन का परम सम्पद् है।
बँगला में इसकी प्रसिद्धि और उपादेयता को देखते हुए नव भारत प्रकाशन, दरभंगा ने इसके हिन्दी अनुवाद को कई खण्डों में प्रकाशित किया। अब शायद यह पुस्तक मुद्रित रूप में अप्राप्य है। इसके कुल ग्यारह खण्डों की क्रमवीक्षित प्रति इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं।
- भारत के महान साधक (प्रथम खण्ड)
- भारत के महान साधक (द्वितीय खण्ड)
- भारत के महान साधक (तृतीय खण्ड)
- भारत के महान साधक (चतुर्थ खण्ड)
- भारत के महान साधक (पंचम खण्ड)
- भारत के महान साधक (षष्ठ खण्ड)
- भारत के महान साधक (सप्तम खण्ड)
- भारत के महान साधक (अष्टम खण्ड)
- भारत के महान साधक (नवम खण्ड)
- भारत के महान साधक (दशम खण्ड)
- भारत के महान साधक (ग्यारहवाँ खण्ड)
कोशिश रहेगी कि आगामी प्रस्तुतियों में इनका पाठ यूनिकोड में उपलब्ध हो।
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